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ताविद्दो॒षा ता उ॒षसि॑ शु॒भस्पती॒ ता याम॑न्रु॒द्रव॑र्तनी । मा नो॒ मर्ता॑य रि॒पवे॑ वाजिनीवसू प॒रो रु॑द्रा॒वति॑ ख्यतम् ॥

अंग्रेज़ी लिप्यंतरण

tāv id doṣā tā uṣasi śubhas patī tā yāman rudravartanī | mā no martāya ripave vājinīvasū paro rudrāv ati khyatam ||

पद पाठ

तौ । इत् । दो॒षा । तौ । उ॒षसि॑ । शु॒भः । पती॒ इति॑ । ता । याम॑न् । रु॒द्रव॑र्तनी॒ इति॑ रु॒द्रऽव॑र्तनी । मा । नः॒ । मर्ता॑य । रि॒पवे॑ । वा॒जि॒नी॒व॒सू॒ इति॑ वाजिनीऽवसू । प॒रः । रु॒द्रौ॒ । अति॑ । ख्य॒त॒म् ॥ ८.२२.१४

ऋग्वेद » मण्डल:8» सूक्त:22» मन्त्र:14 | अष्टक:6» अध्याय:2» वर्ग:7» मन्त्र:4 | मण्डल:8» अनुवाक:4» मन्त्र:14


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शिव शंकर शर्मा

पुनः वही विषय कहा जाता है।

पदार्थान्वयभाषाः - हम प्रजागण (तौ+इत्) उन ही (शुभस्पती) शुभकर्मों के पालक जलप्रदाता और (रुद्रवर्तनी) भयङ्कर मार्गवाले अश्विदेवों को (दोषा) रात्रि में सत्कार करते हैं (ता) उनको ही (उषसि) प्रातःकाल (ता) उनको ही (यामन्) सबकाल और यज्ञों में सत्कार करते हैं (वाजिनीवसू) हे ज्ञानधनो (रुद्रौ) हे दुष्टरोदयिता अश्विद्वय ! आप (नः) हम लोगों को (मर्ताय+रिपवे) दुर्जन मनुष्य के निकट (मा+परः+अति+ख्यतम्) मत फेंकें ॥१४॥
भावार्थभाषाः - प्रजाओं को उचित है कि वे अपने सुख-दुःख की बात राजा के निकट कहें और यथोचित रीति पर उनसे शुभकर्म करावें ॥१४॥
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आर्यमुनि

पदार्थान्वयभाषाः - (तौ, इत्, दोषा) उन्हीं दोनों को रात्रि में (तौ, उषसि) उन्हीं को उषाकाल में (ता) उन्हीं (शुभस्पती) जलादि पदार्थों के रक्षक (रुद्रवर्तनी) भयङ्कररूपधारकों को (यामन्) दिन में आह्वान करते हैं (रुद्रौ) हे दुःखों को द्रावण=दूर करनेवाले (वाजिनीवसू) सेनारूपधनवाले ! आप (मर्ताय, रिपवे) शत्रु मनुष्य को (नः, परः) हमसे अधिक (मा, अति, ख्यतम्) प्रसिद्ध मत करें ॥१४॥
भावार्थभाषाः - हे सब प्रजाओं के दुःख दूर करनेवाले न्यायधीश तथा सेनाधीश ! हम लोग दिन में तथा सब कालों में आपको स्तुतिपूर्वक आह्वान करते हैं, क्योंकि आप अन्न तथा शुद्ध जलों द्वारा हमारे रक्षक हैं। हे रुद्ररूपधारी नेताओ ! आप हमारे दुःखों को दूर करके हमें सुख देनेवाले हैं। आप हमारे शत्रुओं को न बढ़ने दें, किन्तु उनका अपमान करते हुए उनको सदैव वशीभूत रखें, जिससे हमारे यज्ञादि कार्यों में विघ्न न हो ॥१४॥
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शिव शंकर शर्मा

पुनस्तमर्थमाह।

पदार्थान्वयभाषाः - वयं प्रजाः। तावित्=तावेव। शुभस्पती=शुभपती=शुभानां पालयितारौ। रुद्रवर्तनी= भयङ्करमार्गौ। अश्विनौ। दोषा=रात्रौ। आह्वयामः। ता=तौ। उषसि=प्रातःकाले। ता=तौ। यामन्=यामनि दिने च। आह्वयामः। हे वाजिनीवसू=ज्ञानधनौ। हे रुद्रौ=उग्रमूर्ती ! युवाम्। नोऽस्मान्। रिपवे=शत्रवे। मर्ताय=मर्त्याय। परः=परबुद्ध्या। मा+अतिख्यतम्=मा हासिष्टम्=मा त्यजतमित्यर्थः ॥१४॥
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आर्यमुनि

पदार्थान्वयभाषाः - (तौ, इत्, दोषा) तौ हि रात्रौ (तौ, उषसि) तौ उषःकाले (शुभस्पती) जलानां रक्षकौ (रुद्रवर्तनी) रुद्रत्वेन वर्तयन्तौ (ता) तावेव (यामन्) अह्नि आह्वयामः (रुद्रौ) हे दुःखस्य द्रावकौ (वाजिनीवसू) हे सेनाधनौ ! (मर्ताय, रिपवे) शत्रुजनाय (नः, परः) अस्मत्परस्तात् (मा, अति, ख्यतम्) मा अतिप्रख्यापयतम् ॥१४॥